Thursday, 5 May 2016

ग़ज़ल १

गमफरेब ही सही ग़मज़दा तो नहीं
गम छोड़े  कैसे हम खुदा तो नहीं

तुम मसलहत रूठ गए हो हमसे
पर एहसास हमारे जुदा तो नहीं

जिससे प्यार किया वो मेरा न हुआ
कहीं इश्क की यहीं  सजा तो नहीं

उसने मेरी मोहब्बत का क़त्ल किया
पर मैंने उसे इलज़ाम दिया तो नहीं

मुझे हर मतला-ए-दर्द याद है सनम
पर मैंने वो ग़ज़ल में लिखा तो नहीं

हम उन्हें आवाज़ दे-दे कर थक  गए
वो न रुके, बे-दम हमारी सदा तो नहीं

हम किसी को अपना दर्द क्यों बताए
मेरा दर्द-ए-गीत किसी ने सुना तो नहीं

अपना पता या खबर कुछ भी नहीं छोड़ा
लेकिन ‘शुभम’ यहाँ से गुमशुदा तो नहीं||

Monday, 2 May 2016

ग़ज़ल २

तुझे पाने की आरज़ू है दिल में
तू है तो मैं नहीं हूँ  मुश्किल में

ये सफर बहुत आसां है तेरे साथ
तकलीफ नहीं है राह-ए-मंजिल में

जबसे तूमने पकड़ा है हमारा हाथ
हमारा कारवां महफूज़ है साहिल में

ऐ सनम  तुम हमेशा साथ रहो हमारे
खास जगह है तुम्हारी हमारे दिल में

तुम किसी खास के लिए मकसूद हो 'शुभम'
तुम  सभी को नहीं मिलते जिंदगी में


Thursday, 28 April 2016

ग़ज़ल ३

कभी तो आकर देखिये हमको करीब से
करना है तो कीजिये मोहब्बत गरीब से

अजी आप मिल गए हैं जो अब हाँ हमें
शिकायत नहीं है हमको कोई नसीब से

हमको आजमाने से ना घबराइए सनम
छु लीजिये हो जायेंगे हम खुशनसीब से

आपके आने से रौशन हो गए सितारे
आप से पहले हम तो थे बदनसीब से

इस जहा ने  भरोसा हमारा तोड़ दिया
शायद तभी से हो गए हम अजीब से

आपने होठो से अपने जो पिलाया जाम
अब आब-ए-ज़हर लगने लगे लज़ीज़ से

जबसे हमने शहर-ओ-सुखन में कदम रखा
हर किसी को लगने लगे हम अज़ीज़ से

मुझको मेरी माँ की दुआओं ने बचाया

शुभम को जिंदगी मिली है तहजीब से ||

Sunday, 24 April 2016

बापू का देश........

बापू का यह देश दोस्तों 
लगती जैसे बड़ी दुकान
अपने-अपने हिस्से का सब 
बेच रहे है हिन्दुस्तान 

पंडित बेच रहे तीर्थों को 
और पुजारी गावों को 
घाट-घाट पर बेच रहे हैं 
नाविक ही खुद नावों को
गली-गली में ध्वज बिकता 
चौराहों पर बिकते गान 
अपने-अपने हिस्से.......

विद्या बेच रहे अध्यापक 
और चिकित्सक बेचे जान 
लोहा बेच रहे अभियंता 
अपना भारत देश महान 
बेच रहा कर्तव्य परायण 
बीवी -बच्चे का सम्मान |
अपने-अपने हिस्से........

बूथ-बूथ पर वोट बिक रहा 
राजनीती हुई महान 
पैसे हो तो तुम भी ले लो 
लाठी गोली बम पिस्तौल |
माली बेच रहा गुलशन को 
और कोकिला बेचे तान |
अपने-अपने हिस्से........

अधिकारी अध्यक्ष बिकते 
बिकते यहाँ विधायक भी 
मंत्री बिकते नेता बिकते 
सेवक सचिव सहायक भी 
गाँधी जी का कफ़न बेचने 
निकली है उनकी संतान |
अपने-अपने हिस्से......

जाओ कुछ पैसे बटोर लो 
विक्रय के बाज़ार में 
मैं भी खुद को बेच रहा हूँ 
चोरों के बाजार में 
पद मर्यादा न्याय बिकता 
डिग्री जैसे बीडी पान 
अपने-अपने हिस्से........

कोई बेचे कश्मीर को 
कोई बेचे सियाचिन को 
कहीं बीके कारगिल हिमालय 
मानसरोवर बद्री-धाम 
कहीं-कहीं तो बिक रहा है 
बिना मोल भोला इंसान 
अपने-अपने हिस्से का 
सब बेच रहे हैं हिंदुस्तान.......||||

Tuesday, 12 April 2016

भरोसा मत करो........





लड़के ने कहा-
लड़की ने चुपचाप सहा

ओये छम्मक छल्लो
जरा हमारे साथ भी चलो

फिर वो बेचारी चिल्लायी......
छोड़ो मेरा हाथ
मुझे नहीं जाना तुम्हारे साथ
कौन हो तुम???कौन हो  
अगर नहीं छोड़ोगे करना मेरा पीछा
तो मैं चिल्लाउंगी
चिल्ला चिल्ला कर सब को यहाँ बुलाऊंगी

लड़का हंसा और कहा
हा हा हा!!!
क्या कहा?? चिल्लाओगी
लोगो को यहाँ बुलाओगी
हा हा हा!!!!
कोई नहीं आयेगा
जो आएगा, वो भी तमाशा देख चला जाएगा
इस दुनिया को कोई फर्क नहीं पड़ता
तेरी अस्मत लुटती है तो लुट जाए
किसी की बेटी मरती है तो मर जाए ||


तू चाहे जितना चिल्ला ले
चाहे जिसको आवाज़ लगा ले
क्या??तू पुलिस बुलाएगी
हा हा हा!!! पगली पुलिस तो तेरी इज्जत लुटने के बाद ही आएगी |

मेरा मकसद तुझे डराना नहीं था
तुझे नुकसान पहुंचाना  नहीं था
कोशिश थी तुझे जगाने की
तेरे आँखों पर बंधी काली पट्टी हटाने की

मेरी अपनी प्यारी बहन थी
परियों जैसी सुन्दर
मानो ओस की चुम्बन थी
यूँही लौट रही थी घर कॉलेज से
अक्लमंद थी फुल आफ नॉलेज से
गलती शायद उसी की थी
जो हम पर यकीं कर बैठी
सोचती थी भाई, बाप, दोस्त , ये समाज
ये व्यवस्था उसे हर मुश्किल से बचाएगी
बेचारी नादां थी
उसे क्या पता था
ये सारी व्यवस्था उसके मरने के बाद जाग पाएगी



मैं समझाने आया हूँ 
तुम सबको ये बताने आया हूँ
ऐ मेरे देश की बेटियों
मत भरोसा करो किसी पर
अपने लिए खुद लड़ो
चाहे फिर लड़ते लड़ते ही मरो
पर इस दुनिया पर कभी भरोसा मत करो ||
भरोसा मत करो!!!!!




शुभम मिश्र अज़ीम 

Friday, 8 April 2016

ग़ज़ल ४



ताला बंद करूँ या खोलूं डर लगता है
माँ तेरे बिन मरघट जैसा घर लगता हैं

माँ मुझे नींद अब अच्छे से नहीं आती
कांटो भरा  मखमली बिस्तर लगता हैं

माँ सर पर हाथ रखे दर्द दूर हो जाए
यहाँ तो जीवन दर्द-ए-समन्दर लगता है

माँ के हाथ से रोटी खाए अरसा हो गया
यहाँ का लज़ीज़ खाना बी जहर लगता हैं

हर मोड़ पर सारा जहाँ  ठुकरा दे मुझे
माँ को उसका बेटा सिकंदर लगता है

माँ की दुआओं ने यहाँ  सलामत रखा है
यह  माँ की दुआओं का असर लगता है

मेरे लिए केवल  मेरी माँ ही भगवन है
उसके सिवा तो सब पत्थर लगता है

ज़माने की वहशतो में जल रहा था मैं
माँ के साए में  आसां सफ़र लगता है

माँ का बसेरा हैं मेरे दिल-ओ-जहन में
वरना ये गर्द-ए-बदन खंडहर लगता है

ऐ खुदा मेरे नसीब में सब तूने लिखा, पर 
सुख मेरी माँ का लिखा मुकद्दर लगता है

यूँ तो मेरी गजलें  बे-बहर भी हो जाए
माँ का जिक्र आते ही बा-बहर लगता है |

शुभम ये जो शेर लिख रहे हो तुम
यह  माँ का सिखाया हुनर लगता है |


शुभम मिश्र 'अज़ीम' 


Thursday, 31 March 2016

ग़ज़ल ५



जिनके पास नहीं अपने घर होते हैं
उनके लिए फूटपाथ बिस्तर होते हैं

जो भूखे पेट आँखे खोलते हैं जहां में
दो रोटी के लिए वो  दर-बदर होते हैं

ईश्वर ने किसी पर ठप्पा नहीं लगाया
फिर क्यूँ ईश्वर के नाम ग़दर होते हैं

एक ही गंगा का पानी पीते हैं सब
बस तुम उधर तो हम इधर होते हैं

हमने गलतफहमियां पाल ली हैं जबसे
हम पर सभी फ़लसफ़े बेअसर होते हैं

एक ही राम-ओ-रहीम को पूजते हैं हम 
तुम्हारे मस्जिद तो हमारे मंदर होते हैं

‘शुभम’ इस जहां को और बदलना है
ग़मगीन असम-ओ-पेशावर होते हैं 

Friday, 25 March 2016

जब धूप मिली.....

                                        
jaba QaUp imalaI maOM CaÐva banaI
ivastRt SaItla AaOr GanaI–GanaI.
jaba BaI mana maoM krtI laoKa
Aba tk p`ayaÁ maOMnao doKa
hr Aaor tpna hr Aaor jalana
klauiYat mana¸}pr maQaur vacana
haotI jaatI kOsaI vasauQaa
inada-oYa¸zgao jaato bahuQaa.
hr Aaor p`%yaMcaa tnaI–tnaI
jaba QaUp imalaI maOM CaÐva banaI…

maOM dUr–dUr jaato–jaato
mana kI mana maoM gaato–gaato
ivaprIt hI baZ,tI jaatI hUÐ
pr AaOr pasa Aa jaatI hUÐ
[sa jaanao ifr Aa jaanao maoM
]laJana ifr–ifr saulaJaanao maoM
@yaa KaotI @yaa pa jaatI hUÐ
ifr Apnao maoM Kao jaatI hUÐ
jaanaa ifr BaI naa jaana sakI
sacamauca na kBaI phcaana sakI
Kud¸ AnajaanaI–saI zaÐva banaI
jaba QaUp imalaI maOM CaÐva banaI…

Kaokr BaI jaao imala jaata hO
vah Antr tk jaata hO
qaa safr svaaqa- sao Bara huAa
Apnaopna sao yah Bara huAa
vah ismat maurJaayao Aanana kI
jyaaoM klaI iKlaI hao kanana kI
panao ka sauK Kaonao ka ga,ma
mana hÐsata AaÐKoM haotI nama
vao gama ka saagar par kroM
jaanao kba maOM laGau naava banaI.
jaba QaUp imalaI maOM CaÐva banaI..

                                           


Friday, 18 March 2016

ग़ज़ल ६

दिल रो दिया देख दर्दनाक मंज़र
रोकर कर दिए हमने खार समंदर

कब तलक यूँ ही सहते रहेंगे हम
आक्रोश भर चूका दिल के अन्दर

तुम्हारी लकीरों में हार लिखी है  
मियाँ पोरस हो तुम,नहीं सिकंदर

ताश के खेल में मजा बहुत है
लत लगे तो बन जाए भयंकर 

दिन यूँ ही कट गया फिर आज

‘शुभम’ कुछ भी न किया सुन्दर 
                        
                                          शुभम मिश्र 'अज़ीम' 

Sunday, 13 March 2016

ग़ज़ल ७

जब छोटे थे तो रोते थे हम सोने के लिए
बड़े हो गए तो सोते हैं हम रोने के लिए

अब सिर्फ गंगा नहाने से कुछ नहीं होगा
कुछ नया इजात करो पाप धोने के लिए

मेरी बेटी की डोली आज विदा न हो पाई
कहाँ से लाऊं दहेज़ उसके गोने के लिए

मेरे बच्चे को इल्म है हमारी गरीब का
मेले में जिद नहीं करता खिलोने के लिए

दुनिया में माँ जैसा दूसरा  कोई नहीं है 
आँचल बिछा देती हैं बिछोने के लिए

गरीबी में रिश्तो की माला बिखर गयी
अमीरी की डोर चाहिए पिरोने के लिए

मैं खुली आँखों से ही ख्वाब देखता हूँ
नींद आती नहीं सपने सजोने के लिए

मुझे उन्होंने मोहब्बत में बेइंतेहा लुटा
‘शुभम’ अब बचा ही नहीं खोने के लिए|| 

                                               शुभम मिश्र 'अज़ीम' 

Saturday, 5 March 2016

हमारे तुम्हारे दरमियाँ

हमारे तुम्हारे दरमियाँ बस इतनी दूरी रहे 
कितनी भी बार मिले मुलाकात अधूरी रहे

तेरी आँखों से शबनम बरसे, मैं पीता जाऊं 
तू मेरी होगी या ना होगी ये प्यास जरुरी रहे

तूने जो लिखे अशआर वो मेरा वजीफा हैं 
इनकार न करना तुम चाहे नफरत पूरी रहे

इस सफ़र में तुम मेरे साथ-साथ चलना 
चाहे थकन हो कितनी चेहरे पे नूरी रहे

जितने भी थे मुर्ख सारे बैठ गए सिंहासन 
फिर भी नारा गूँज रहा, व्यवस्था जम्हूरी रहे

करने को सारे कुफ्र कर गए यहाँ पर हम 
'शुभम' चाहत हैं फिर भी मेरी मशहूरी रहे ||


-शुभम मिश्र 

Wednesday, 2 March 2016

ग़ज़ल जिंदगी के नाम

किताबें गुम हुई लैपटॉप में समाई जिंदगी 
खतों से चलकर के चैट तलक आई जिंदगी


इश्क की बातें खुद से अब अकेले में होती हैं 
हर बात पर करने लगती है अब बुराई जिंदगी

हमको ऐशो-आराम सारे मय्यसर है यहाँ पर 
किसी ने तो खुले आसमान तले बिताई जिंदगी

खुलकर के जीने का दिखावा किया उम्र भर 
मगर खुद से ही खुद की हमने छुपाई जिंदगी

शौक से चलते रहे हम पतली सी मुंडेर पर 
मुंडेर के बीच किसानों ने क्यूँ गवाई जिंदगी

हर बात में मुंसिफ को हमने गुनहगार कह दिया 
जिंदगी भर हमने ना कभी खुशगवार बनाई जिंदगी

बड़ा हुआ तो माँ को बेटे ने जिंदगी से निकाला 
बेटे के लिए माँ ने सारी जिंदगी बिछाई जिंदगी

कोशिशें कर कर के बहुत थक चुका है शुभम 
ना जाने मुझसे किस बात पर है खिसिआइ जिंदगी |

Tuesday, 1 March 2016

आज इस सफर का आगाज़ करता हूँ.......

||आज इस सफर का आगाज़ करता हूँ 
मैं अदब की नयी  परवाज़ करता हूँ ||