Sunday, 13 March 2016

ग़ज़ल ७

जब छोटे थे तो रोते थे हम सोने के लिए
बड़े हो गए तो सोते हैं हम रोने के लिए

अब सिर्फ गंगा नहाने से कुछ नहीं होगा
कुछ नया इजात करो पाप धोने के लिए

मेरी बेटी की डोली आज विदा न हो पाई
कहाँ से लाऊं दहेज़ उसके गोने के लिए

मेरे बच्चे को इल्म है हमारी गरीब का
मेले में जिद नहीं करता खिलोने के लिए

दुनिया में माँ जैसा दूसरा  कोई नहीं है 
आँचल बिछा देती हैं बिछोने के लिए

गरीबी में रिश्तो की माला बिखर गयी
अमीरी की डोर चाहिए पिरोने के लिए

मैं खुली आँखों से ही ख्वाब देखता हूँ
नींद आती नहीं सपने सजोने के लिए

मुझे उन्होंने मोहब्बत में बेइंतेहा लुटा
‘शुभम’ अब बचा ही नहीं खोने के लिए|| 

                                               शुभम मिश्र 'अज़ीम' 

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