किताबें गुम हुई लैपटॉप में समाई जिंदगी
खतों से चलकर के चैट तलक आई जिंदगी
इश्क की बातें खुद से अब अकेले में होती हैं
हर बात पर करने लगती है अब बुराई जिंदगी
हमको ऐशो-आराम सारे मय्यसर है यहाँ पर
किसी ने तो खुले आसमान तले बिताई जिंदगी
खुलकर के जीने का दिखावा किया उम्र भर
मगर खुद से ही खुद की हमने छुपाई जिंदगी
शौक से चलते रहे हम पतली सी मुंडेर पर
मुंडेर के बीच किसानों ने क्यूँ गवाई जिंदगी
हर बात में मुंसिफ को हमने गुनहगार कह दिया
जिंदगी भर हमने ना कभी खुशगवार बनाई जिंदगी
बड़ा हुआ तो माँ को बेटे ने जिंदगी से निकाला
बेटे के लिए माँ ने सारी जिंदगी बिछाई जिंदगी
कोशिशें कर कर के बहुत थक चुका है शुभम
ना जाने मुझसे किस बात पर है खिसिआइ जिंदगी |
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