हमारे तुम्हारे दरमियाँ बस इतनी दूरी रहे
कितनी भी बार मिले मुलाकात अधूरी रहे
तेरी आँखों से शबनम बरसे, मैं पीता जाऊं
तू मेरी होगी या ना होगी ये प्यास जरुरी रहे
तूने जो लिखे अशआर वो मेरा वजीफा हैं
इनकार न करना तुम चाहे नफरत पूरी रहे
इस सफ़र में तुम मेरे साथ-साथ चलना
चाहे थकन हो कितनी चेहरे पे नूरी रहे
जितने भी थे मुर्ख सारे बैठ गए सिंहासन
फिर भी नारा गूँज रहा, व्यवस्था जम्हूरी रहे
करने को सारे कुफ्र कर गए यहाँ पर हम
'शुभम' चाहत हैं फिर भी मेरी मशहूरी रहे ||
-शुभम मिश्र
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