Thursday, 31 March 2016

ग़ज़ल ५



जिनके पास नहीं अपने घर होते हैं
उनके लिए फूटपाथ बिस्तर होते हैं

जो भूखे पेट आँखे खोलते हैं जहां में
दो रोटी के लिए वो  दर-बदर होते हैं

ईश्वर ने किसी पर ठप्पा नहीं लगाया
फिर क्यूँ ईश्वर के नाम ग़दर होते हैं

एक ही गंगा का पानी पीते हैं सब
बस तुम उधर तो हम इधर होते हैं

हमने गलतफहमियां पाल ली हैं जबसे
हम पर सभी फ़लसफ़े बेअसर होते हैं

एक ही राम-ओ-रहीम को पूजते हैं हम 
तुम्हारे मस्जिद तो हमारे मंदर होते हैं

‘शुभम’ इस जहां को और बदलना है
ग़मगीन असम-ओ-पेशावर होते हैं 

No comments:

Post a Comment