Friday, 8 April 2016

ग़ज़ल ४



ताला बंद करूँ या खोलूं डर लगता है
माँ तेरे बिन मरघट जैसा घर लगता हैं

माँ मुझे नींद अब अच्छे से नहीं आती
कांटो भरा  मखमली बिस्तर लगता हैं

माँ सर पर हाथ रखे दर्द दूर हो जाए
यहाँ तो जीवन दर्द-ए-समन्दर लगता है

माँ के हाथ से रोटी खाए अरसा हो गया
यहाँ का लज़ीज़ खाना बी जहर लगता हैं

हर मोड़ पर सारा जहाँ  ठुकरा दे मुझे
माँ को उसका बेटा सिकंदर लगता है

माँ की दुआओं ने यहाँ  सलामत रखा है
यह  माँ की दुआओं का असर लगता है

मेरे लिए केवल  मेरी माँ ही भगवन है
उसके सिवा तो सब पत्थर लगता है

ज़माने की वहशतो में जल रहा था मैं
माँ के साए में  आसां सफ़र लगता है

माँ का बसेरा हैं मेरे दिल-ओ-जहन में
वरना ये गर्द-ए-बदन खंडहर लगता है

ऐ खुदा मेरे नसीब में सब तूने लिखा, पर 
सुख मेरी माँ का लिखा मुकद्दर लगता है

यूँ तो मेरी गजलें  बे-बहर भी हो जाए
माँ का जिक्र आते ही बा-बहर लगता है |

शुभम ये जो शेर लिख रहे हो तुम
यह  माँ का सिखाया हुनर लगता है |


शुभम मिश्र 'अज़ीम' 


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