Thursday, 5 May 2016

ग़ज़ल १

गमफरेब ही सही ग़मज़दा तो नहीं
गम छोड़े  कैसे हम खुदा तो नहीं

तुम मसलहत रूठ गए हो हमसे
पर एहसास हमारे जुदा तो नहीं

जिससे प्यार किया वो मेरा न हुआ
कहीं इश्क की यहीं  सजा तो नहीं

उसने मेरी मोहब्बत का क़त्ल किया
पर मैंने उसे इलज़ाम दिया तो नहीं

मुझे हर मतला-ए-दर्द याद है सनम
पर मैंने वो ग़ज़ल में लिखा तो नहीं

हम उन्हें आवाज़ दे-दे कर थक  गए
वो न रुके, बे-दम हमारी सदा तो नहीं

हम किसी को अपना दर्द क्यों बताए
मेरा दर्द-ए-गीत किसी ने सुना तो नहीं

अपना पता या खबर कुछ भी नहीं छोड़ा
लेकिन ‘शुभम’ यहाँ से गुमशुदा तो नहीं||

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