गमफरेब ही सही ग़मज़दा
तो नहीं
गम छोड़े कैसे हम खुदा तो नहीं
तुम मसलहत रूठ गए हो
हमसे
पर एहसास हमारे जुदा
तो नहीं
जिससे प्यार किया वो
मेरा न हुआ
कहीं इश्क की यहीं सजा तो नहीं
उसने मेरी मोहब्बत
का क़त्ल किया
पर मैंने उसे इलज़ाम
दिया तो नहीं
मुझे हर मतला-ए-दर्द
याद है सनम
पर मैंने वो ग़ज़ल में
लिखा तो नहीं
हम उन्हें आवाज़
दे-दे कर थक गए
वो न रुके, बे-दम
हमारी सदा तो नहीं
हम किसी को अपना
दर्द क्यों बताए
मेरा दर्द-ए-गीत
किसी ने सुना तो नहीं
अपना पता या खबर कुछ भी नहीं
छोड़ा
लेकिन ‘शुभम’ यहाँ
से गुमशुदा तो नहीं||